उत्तरकाशीउत्तराखंडगढ़वालपर्यटनपौराणिक
Trending

पलायन की मार से सूने पड़े पहाड़, सरकारों की उदासीनता ने उजाड़ दिए जखाली, धौंसाली और घुंड के गांव

सड़क के नाम पर कटे सैकड़ों पेड़, लेकिन आज तक नहीं पहुंची सड़क; विकास के दावों की खुली पोल, ग्रामीणों ने उठाए बड़े सवाल

प्रकृति की गोद में बसे पुरोला विधानसभा क्षेत्र के ग्राम पंचायत कोटला अंतर्गत जखाली, धौंसाली और घुंड गांव आज सरकारी उपेक्षा और विकास योजनाओं की विफलता की दर्दनाक कहानी बयां कर रहे हैं। कभी खेती-बाड़ी, पशुपालन और समृद्ध ग्रामीण जीवन के लिए पहचाने जाने वाले ये गांव अब पलायन की मार झेल रहे हैं। अधिकांश परिवार अपने पुश्तैनी मकान, खेत-खलिहान और सांस्कृतिक विरासत को छोड़कर मठ, महरगांव, धिवरा, भद्राली, खड़क्यासेम सहित अन्य क्षेत्रों में बस चुके हैं।

 

ग्रामीणों का कहना है कि दशकों से सरकारें पहाड़ों में विकास और पलायन रोकने के बड़े-बड़े दावे करती रही हैं, लेकिन जखाली, धौंसाली और घुंड जैसे गांव आज भी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। यही कारण है कि लोगों को मजबूरन अपने गांव छोड़ने पड़े।

पौराणिक मेला भी बनता जा रहा औपचारिकता

क्षेत्र का प्रसिद्ध सोमेश्वर महाराज पौराणिक मेला भी अब अपनी पुरानी पहचान खोता जा रहा है। वर्ष में एक बार ग्रामीण अपने ईष्ट देव के दर्शन और मेले में शामिल होने गांव पहुंचते हैं, लेकिन उनके सामने जर्जर मकान, बंजर खेत और वीरान आंगन दिखाई देते हैं। यह दृश्य ग्रामीणों को अपनी जड़ों से कटने की पीड़ा का एहसास कराता है।

सड़क का सर्वे हुआ, जंगल कटे, लेकिन सड़क नहीं बनी

ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों पहले सड़क निर्माण के लिए सर्वे किया गया था और सैकड़ों पेड़ों की कटाई भी की गई। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के बावजूद सड़क निर्माण का कार्य आज तक शुरू नहीं हो पाया। ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि जब सड़क बननी ही नहीं थी तो जंगलों की बलि क्यों दी गई? और यदि सड़क स्वीकृत थी तो उसका निर्माण अब तक क्यों नहीं हुआ?

विकास की अपार संभावनाओं वाला क्षेत्र

ग्राम प्रधान ऐलम पंवार, गोविंद सिंह पंवार, व्यापार मंडल अध्यक्ष अंकित पंवार तथा सोमेश्वर महाराज मंदिर समिति अध्यक्ष दरम्यान सिंह का कहना है कि यदि समय रहते क्षेत्र को सड़क और अन्य सुविधाओं से जोड़ा गया होता तो यह इलाका कृषि, बागवानी और ग्रामीण पर्यटन के क्षेत्र में पूरे उत्तराखंड में अलग पहचान बना सकता था। लेकिन सरकारी उदासीनता और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव ने इन गांवों को वीरान होने के लिए छोड़ दिया।

बड़ा सवाल

जब सरकारें पलायन आयोग का गठन करती हैं, करोड़ों रुपये खर्च करने के दावे करती हैं और रिवर्स पलायन की बातें करती हैं, तब जखाली, धौंसाली और घुंड जैसे गांव यह सवाल पूछ रहे हैं कि विकास के नक्शे में उनकी जगह आखिर कब बनेगी?

यदि समय रहते इन गांवों की सुध नहीं ली गई तो वह दिन दूर नहीं जब ये गांव केवल सरकारी फाइलों और राजस्व अभिलेखों में ही दर्ज रह जाएंगे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button