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पुरोला विधानसभा की राजनीति में बड़ा उलटफेर! 2022 वाले समीकरण अब पड़े कमजोर

जिस “गरीब के बेटे” के नाम पर एकजुट हुआ था पूरा कुनबा, अब उसी चेहरे के खिलाफ अंदरखाने बढ़ रही नाराजगी

पुरोला विधानसभा में 2027 के चुनावी रण की औपचारिक शुरुआत भले अभी न हुई हो, लेकिन राजनीतिक सरगर्मियां लगातार तेज होती जा रही हैं। इसी बीच 2022 विधानसभा चुनाव के समीकरण एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। क्योंकि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद पहली बार ऐसा हुआ था जब प्रदेश में जिस दल की सरकार बनी, पुरोला विधानसभा से विधायक भी उसी दल का चुनकर गया।

वर्ष 2022 के चुनाव में भाजपा प्रत्याशी दुर्गेश लाल और कांग्रेस प्रत्याशी रहे पूर्व विधायक मालचंद के बीच सीधा मुकाबला था। उस दौरान भाजपा ने “गरीब के बेटे” की भावनात्मक छवि को जनता के बीच प्रमुखता से रखा था। मोरी क्षेत्र से “रवांई जन एकता मंच” ने भी भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में पूरी ताकत झोंक दी थी।

इसके साथ ही पूर्व विधायक स्वर्गीय राजेश जुवांठा ने संगठन के निर्देशों का पालन करते हुए भाजपा प्रत्याशी को जिताने के लिए सक्रिय भूमिका निभाई थी। वहीं कांग्रेस छोड़ भाजपा में लौटे पूर्व विधायक राजकुमार ने भी चुनाव में अपना प्रभाव और राजनीतिक अनुभव लगाया था।

वर्षों से संगठन के साथ जुड़े कार्यकर्ताओं ने भी बूथ स्तर तक पार्टी को मजबूती दी। नतीजा यह रहा कि भाजपा प्रत्याशी दुर्गेश लाल को लगभग 26 हजार वोट मिले और भाजपा करीब 5 हजार मतों से चुनाव जीतने में सफल रही।

लेकिन अब 2027 की तस्वीर 2022 से काफी अलग दिखाई देने लगी है।

सबसे बड़ा राजनीतिक झटका भाजपा को वहीं से लगता दिख रहा है, जहां से पिछली बार सबसे मजबूत समर्थन मिला था। जिस “रवांई जन एकता मंच” ने एकजुट होकर दुर्गेश लाल की राजनीति को नई पहचान दी थी, अब वही मंच उनके घर से ही विरोध में खड़ा दिखाई दे रहा है।

दूसरी ओर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के समीकरण भी बदल चुके हैं। पूर्व विधायक स्वर्गीय राजेश जुवांठा अब इस दुनिया में नहीं रहे। वहीं 2022 में कांग्रेस प्रत्याशी रहे मालचंद अब भाजपा में वापसी के बाद खुद टिकट के मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि जनता का एक वर्ग फिर से उनके पक्ष में खड़ा होता दिखाई दे रहा है।

उधर नौगांव क्षेत्र से पूर्व विधायक और भाजपा के दर्जाधारी मंत्री रहे राजकुमार भी वर्तमान विधायक के विवादित बयानों और अन्य कारणों के चलते खुलकर साथ खड़े नजर नहीं आ रहे हैं।

अब भाजपा की सबसे बड़ी ताकत माने जाने वाले पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। लंबे समय तक पार्टी का झंडा उठाने वाले कार्यकर्ताओं के बीच अंदरखाने असंतोष की बातें सामने आ रही हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि पुराने कार्यकर्ताओं की लगातार अनदेखी हुई, जबकि कांग्रेस पृष्ठभूमि से आए नेताओं को अधिक महत्व दिया गया।

राजनीतिक जानकारों की नजर सबसे ज्यादा इसी समीकरण पर टिकी हुई है। क्योंकि 2022 में कांग्रेस प्रत्याशी रहे मालचंद करीब 21 हजार वोट हासिल करने में सफल रहे थे, जबकि उस समय उनके पक्ष में कोई बड़ा राजनीतिक समीकरण नहीं था। ऐसे में यदि भाजपा के भीतर असंतोष खुलकर सामने आता है और “एकता मंच” विरोध में बना रहता है, तो 2027 का मुकाबला भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

अब सबसे बड़ी नजर इस बात पर टिकी है कि भाजपा 2027 में पुरोला विधानसभा से किस चेहरे पर दांव लगाती है और क्या पार्टी समय रहते अपने बिखरते समीकरणों को संभाल पाएगी या नहीं।

सबसे बड़ा सवाल…

क्या 2022 की जीत का वही फार्मूला अब 2027 में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रहा है?

और क्या इस बार पुरोला विधानसभा का चुनाव सिर्फ विपक्ष से नहीं, बल्कि भीतर की नाराजगी से भी लड़ा जाएगा?

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