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प्रागैतिहासिक युग की याद दिलाता रवाई-जौनपुर का ऐतिहासिक मौण मेला, सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवित

टिमरू वनस्पति, सामूहिक शिकार और लोक संस्कृति का अनूठा संगम है मौण मेला

उत्तरकाशी/टिहरी।

उत्तराखंड की लोक संस्कृति अपने भीतर हजारों वर्षों का इतिहास समेटे हुए है। यहां के मेले और पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज के पुराने जीवन, प्रकृति के साथ रिश्ते और सामूहिक व्यवस्था की पहचान भी हैं। इन्हीं परंपराओं में शामिल है रवाई-जौनपुर क्षेत्र का ऐतिहासिक मौण मेला, जो आज भी पहाड़ की प्राचीन संस्कृति को जीवित रखे हुए है।

आज आयोजित हुए इस ऐतिहासिक मेले में ग्रामीणों ने सदियों पुरानी परंपरा को निभाया। ढोल-दमाऊं, रणसिंघा और लोकगीतों के बीच ग्रामीण नदी तट पर पहुंचे और सामूहिक रूप से मौण की रस्म पूरी की।

मौण मेले की प्राचीन परंपरा

मौण शब्द का संबंध सामूहिक रूप से किसी कार्य को करने से माना जाता है। पुराने समय में रवाई क्षेत्र की कम जल वाली नदियों और गधेरों में ग्रामीण सामूहिक रूप से मछली पकड़ते थे। यही आयोजन आगे चलकर मौण मेले के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

यह केवल मछली पकड़ने का तरीका नहीं था, बल्कि पूरे समाज के एक साथ आने, सहयोग करने और अपनी परंपराओं को निभाने का माध्यम था।

तिथि तय करने की परंपरा

पुराने समय में मौण मेले की तिथि गांवों के सयाणे, प्रधान और थोकदारों की पंचायत में तय की जाती थी। विचार-विमर्श के बाद मेले की तारीख निश्चित होती और आसपास के गांवों को इसकी सूचना दी जाती थी।

इसके बाद गांवों में तैयारियां शुरू हो जाती थीं। चौपालों में लोकगीत गाए जाते और मेले का माहौल बनने लगता था।

टिमरू वनस्पति का महत्व

मौण मेले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा टिमरू पौधे से जुड़ा था। टिमरू के बीज, छाल और पत्तियों को सुखाकर उसका चूर्ण तैयार किया जाता था।

जिस गांव की जिम्मेदारी होती थी, उसे पर्याप्त मात्रा में टिमरू चूर्ण तैयार करना पड़ता था। यह पूरी व्यवस्था सामूहिक जिम्मेदारी पर आधारित थी।

मेले के दिन टिमरू चूर्ण को नदी में प्रवाहित किया जाता था। स्थानीय मान्यता के अनुसार इसके प्रभाव से मछलियां कुछ समय के लिए सुस्त होकर पानी की सतह पर आने लगती थीं, जिसके बाद ग्रामीण उन्हें पकड़ते थे।

दो दलों की परंपरा

मौण मेले में दो प्रमुख दल शामिल होते थे। दोनों दल अपने-अपने क्षेत्र और परंपरा का प्रतिनिधित्व करते थे।

दोनों पक्ष नदी के अलग-अलग किनारों पर खड़े होते थे और संकेत मिलने के बाद मौण नदी में डाला जाता था। इसके बाद शुरू होता था सामूहिक मछली पकड़ने का आयोजन।

लोकगीत और देव संस्कृति

मेले की शुरुआत पूजा-अर्चना से होती थी। ग्रामीण अपने इष्ट देवताओं का आशीर्वाद लेकर यात्रा शुरू करते थे।

ढोल-दमाऊं और रणसिंघे की ध्वनि के साथ लोकगीत गाए जाते थे। रास्ते में लेबुआ जैसे पारंपरिक गीत और नृत्य मेले को जीवंत बनाते थे।

प्रागैतिहासिक जीवन शैली की झलक

इतिहासकारों के अनुसार मौण मेला मानव सभ्यता के उस दौर की याद दिलाता है जब मनुष्य शिकारी और संग्रहकर्ता जीवन जीता था।

उस समय भोजन और जीवन की आवश्यकताओं के लिए पूरा समुदाय मिलकर काम करता था। मौण मेला उसी सामूहिक जीवन शैली की एक जीवित स्मृति माना जाता है।

कृषि और लोकविश्वास

स्थानीय लोगों का विश्वास रहा है कि मौण मेले का संबंध कृषि जीवन से भी जुड़ा हुआ है। सामूहिक गतिविधियों और ग्रामीणों की आवाजाही से खेतों और आसपास के क्षेत्रों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता था।

यह परंपरा बताती है कि पहाड़ का समाज प्रकृति, कृषि और सामुदायिक जीवन को एक साथ जोड़कर देखता था।

आज भी बनी हुई है पहचान

आधुनिक समय में भले ही जीवन शैली बदल गई हो, लेकिन मौण मेला आज भी रवाई-जौनपुर क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है।

यह मेला नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, इतिहास और लोक विरासत से जोड़ने का काम कर रहा है।

इस रिपोर्ट में शामिल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जानकारी डॉ. चंद्रकांत रावत और डॉ. प्रहलाद रावत की पुस्तक “उत्तराखंड का जन इतिहास” से ली गई है। मौण मेले की विस्तृत जानकारी के लिए इस पुस्तक का अध्ययन किया जा सकता है।

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