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जहां चींटियों ने तय की मंदिर की नींव, वहां शिल्पकार रच रहे इतिहास; फिताड़ी में आकार ले रहा भव्य सोमेश्वर धाम

रवांई घाटी की प्राचीन “किमले की सूत्री” परंपरा के अनुसार हो रहा मंदिर निर्माण, बिना आधुनिक मशीनों के जीवंत हो रही लोकशिल्प कला

मोरी (उत्तरकाशी)। रवांई घाटी अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति, दैवीय आस्था और अद्वितीय वास्तुकला के लिए विशेष पहचान रखती है। यहां के प्राचीन मंदिर केवल श्रद्धा के केंद्र ही नहीं, बल्कि स्थानीय शिल्पकारों की बेजोड़ कला और सांस्कृतिक विरासत के जीवंत प्रतीक भी हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मोरी विकासखंड के फिताड़ी गांव में निर्माणाधीन सोमेश्वर महाराज मंदिर इन दिनों श्रद्धालुओं और कला प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

मंदिर निर्माण में गांव के कुशल राजमिस्त्री एवं शिल्पकार मलाठा बंधु पारंपरिक नक्काशी कला का अद्भुत प्रदर्शन कर रहे हैं। आधुनिक मशीनों के दौर में भी मंदिर की नक्काशी और शिल्प कार्य पारंपरिक औजारों से किया जा रहा है, जिससे इसकी प्राचीन वास्तु शैली और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखा जा सके।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार सोमेश्वर महाराज मंदिर की मूल संरचना (सूत्रायी) का निर्धारण सर्वप्रथम चींटियों द्वारा किया गया था। इसी कारण इस पौराणिक निर्माण शैली को क्षेत्र में “किमले की सूत्री” के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि मंदिर के नव निर्माण से पूर्व क्षेत्रीय ईष्ट सोमेश्वर महाराज ने अवतरित होकर मंदिर की मूल नींव और स्वरूप को यथावत बनाए रखने का संदेश दिया था। इसके बाद ग्रामीणों ने आस्था और परंपरा का सम्मान करते हुए उसी आधार पर मंदिर को नया स्वरूप देने का संकल्प लिया।

गांव के वरिष्ठ नागरिक पग्गूराम बताते हैं कि चींटियों द्वारा निर्धारित इस पौराणिक स्वरूप के कारण मंदिर का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यही वजह है कि निर्माण कार्य में पूरे गांव के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों के लोग भी बढ़-चढ़कर सहयोग कर रहे हैं।

 

ग्राम प्रधान कृष्णा राणा के अनुसार सोमेश्वर महाराज मंदिर संपूर्ण ग्रामसभा और क्षेत्रवासियों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। ग्रामीणों के सामूहिक सहयोग और समर्पण से निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि मंदिर निर्माण पूर्ण होने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ भव्य प्राण-प्रतिष्ठा समारोह आयोजित किया जाएगा, जिसमें रवांई घाटी सहित दूर-दूर से श्रद्धालु शामिल होंगे।

 

रवांई घाटी के इस मंदिर में एक ओर सदियों पुरानी लोकआस्थाएं जीवंत हैं तो दूसरी ओर स्थानीय शिल्पकारों की परंपरागत निर्माण तकनीकें और कला नई पीढ़ी तक सांस्कृतिक धरोहर पहुंचाने का कार्य कर रही हैं। फिताड़ी का सोमेश्वर महाराज मंदिर आज आस्था, संस्कृति और लोकशिल्प के अद्भुत संगम का प्रतीक बनकर उभर रहा है।

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