फिताड़ी में अल्ट्रासाउंड के नाम पर ₹25 लाख! मोरी CHC की अनदेखी पर उठे सवाल
यमुना घाटी कांग्रेस जिलाध्यक्ष दिनेश चौहान ने जिला योजना के प्रस्ताव पर उठाए गंभीर सवाल, मोरी CHC में अल्ट्रासाउंड सुविधा देने की मांग

पुरोला। यमुना घाटी में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर एक बार फिर जिला योजना की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। फिताड़ी स्थित आयुर्वेदिक उपकेंद्र में अल्ट्रासाउंड मशीन के लिए ₹25 लाख का बजट आवंटित किए जाने पर यमुना घाटी कांग्रेस जिलाध्यक्ष दिनेश चौहान ने गंभीर सवाल उठाते हुए इसे सरकारी धन के उपयोग और योजना निर्माण की प्रक्रिया पर बड़ा प्रश्नचिह्न बताया है।
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दिनेश चौहान का कहना है कि जिस स्थान पर न स्वास्थ्य विभाग का अपना भवन है, न एलोपैथिक अस्पताल, न विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती और न ही बेहतर सड़क संपर्क, वहां अल्ट्रासाउंड मशीन के लिए लाखों रुपये का बजट स्वीकृत करना आखिर किस आधार पर उचित माना गया?
जहां रोज पहुंचते हैं मरीज, वहां सुविधा क्यों नहीं?
मोरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र करीब 63 गांवों की स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख केंद्र है। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में ग्रामीण उपचार के लिए पहुंचते हैं। खासकर गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को अल्ट्रासाउंड जांच के लिए दूर-दराज के अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि अल्ट्रासाउंड मशीन के लिए ₹25 लाख उपलब्ध थे, तो मोरी CHC को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई?
क्या जिला योजना तैयार करते समय क्षेत्र की वास्तविक स्वास्थ्य जरूरतों का आकलन किया गया था? क्या प्रस्ताव स्वीकृत करने से पहले मौके का स्थलीय निरीक्षण हुआ? और यदि हुआ, तो क्या अधिकारियों को वहां की वास्तविक परिस्थितियों की जानकारी नहीं थी?
अल्ट्रासाउंड मशीन चलेगी कहां?
चौहान का दावा है कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने भी यह स्पष्ट किया है कि आयुर्वेदिक उपकेंद्र में अल्ट्रासाउंड मशीन स्थापित करना संभव नहीं है। यदि यह बात सही है तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि ऐसी जगह के लिए ₹25 लाख का प्रस्ताव तैयार किसने किया और उसे मंजूरी किस स्तर पर दी गई?
क्या सरकारी बजट आवंटित करने से पहले संबंधित विभागों के बीच समन्वय नहीं किया गया?
क्या जिला योजना की बैठकों में प्रस्तावों की उपयोगिता और व्यवहारिकता की जांच महज कागजों तक सीमित रह गई है?
जिम्मेदारों से जवाब जरूरी
दिनेश चौहान ने शासन और जिला प्रशासन से फिताड़ी के लिए स्वीकृत बजट की तत्काल समीक्षा कर उसे मोरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में अल्ट्रासाउंड मशीन स्थापित करने के लिए उपयोग किए जाने की मांग की है।
साथ ही उन्होंने जिला योजना के प्रस्तावों की जांच कर यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि सरकारी धन वास्तविक जरूरत और जनहित के आधार पर खर्च हो।
अब सवाल सिर्फ ₹25 लाख का नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं की प्राथमिकता और जवाबदेही का है। यदि किसी ऐसे स्थान पर स्वास्थ्य उपकरण के लिए बजट स्वीकृत किया गया है जहां उसे स्थापित करना ही संभव नहीं बताया जा रहा, तो आखिर इस निर्णय की जिम्मेदारी किसकी है?
जनता जानना चाहती है—मोरी जैसे बड़े स्वास्थ्य केंद्र की जरूरत को नजरअंदाज कर यह फैसला किस आधार पर लिया गया? और अगर योजना व्यवहारिक नहीं है तो सरकारी धन की बर्बादी की जिम्मेदारी कौन लेगा?



