नौगांव के गांवों में पलायन की मार, जखाली-धोसाली-घूंड और कोटला में 90 फीसदी तक पलायन का दावा
खाली मकान और वीरान होते खेत बयां कर रहे पहाड़ की पीड़ा, सैनिक प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष दर्मियान सिंह पंवार ने सरकार से मांगी विशेष कार्ययोजना

नौगांव/उत्तरकाशी। उत्तरकाशी जिले के नौगांव विकासखंड के जखाली, धोसाली, घूंड और कोटला सहित आसपास के गांवों में बढ़ता पलायन चिंता का विषय बनता जा रहा है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार इन गांवों से करीब 90 प्रतिशत तक पलायन हो चुका है। हालांकि इस आंकड़े की वर्तमान आधिकारिक पुष्टि के लिए ग्रामवार प्रशासनिक सर्वे की आवश्यकता है।

कभी ग्रामीणों की चहल-पहल, खेती-बाड़ी और सामुदायिक जीवन से आबाद रहने वाले इन गांवों की तस्वीर अब बदलती दिखाई दे रही है। कई मकान खाली पड़े हैं और अनेक खेतों में खेती का दायरा लगातार घट रहा है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और अन्य मूलभूत सुविधाओं की तलाश में ग्रामीण परिवार गांव छोड़कर कस्बों और मैदानी क्षेत्रों की ओर जा रहे हैं।

खाली मकान और वीरान खेत दे रहे पलायन की गवाही
जखाली, धोसाली और घूंड जैसे गांवों में खाली पड़े मकान पलायन की स्थिति को सामने ला रहे हैं। कई परिवार पूरी तरह गांव छोड़ चुके हैं, जबकि कुछ परिवारों में केवल बुजुर्ग सदस्य ही गांव में रह गए हैं। पलायन का असर खेती, पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे रहा है। जिन खेतों में कभी नियमित खेती होती थी, उनमें से कई अब कम उपयोग में आ रहे हैं।

सड़क और मूलभूत सुविधाओं की कमी बनी चुनौती
ग्रामीणों के अनुसार दूरस्थ गांवों में सड़क और नियमित परिवहन की समस्या अब भी बड़ी चुनौती है। इसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और कृषि उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने पर पड़ता है। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में ग्रामीणों को उपचार के लिए दूर जाना पड़ता है, जबकि बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए परिवारों को गांव से बाहर रहना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियां धीरे-धीरे स्थायी पलायन का कारण बनती हैं।
दर्मियान सिंह पंवार ने जताई चिंता
सैनिक प्रकोष्ठ, यमुना घाटी उत्तरकाशी के जिला अध्यक्ष दर्मियान सिंह पंवार ने जखाली, धोसाली, घूंड और कोटला समेत आसपास के गांवों में हो रहे पलायन पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पहाड़ से पलायन को केवल आंकड़ों के रूप में नहीं, बल्कि गांवों के भविष्य से जोड़कर देखने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि यदि ग्रामीणों के अनुसार इन गांवों से करीब 90 प्रतिशत तक परिवार पलायन कर चुके हैं तो यह गंभीर स्थिति है। उन्होंने सरकार और प्रशासन से इन गांवों का ग्रामवार सर्वे कराने की मांग की, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कितने परिवार गांव छोड़ चुके हैं और पलायन के पीछे प्रमुख कारण क्या हैं।
गांव में रोजगार के अवसर पैदा करने की मांग
पंवार ने कहा कि केवल योजनाओं की घोषणा से पलायन नहीं रुकेगा। गांवों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, संचार और रोजगार की ठोस व्यवस्था जरूरी है। युवाओं को स्थानीय स्तर पर आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने पर ही उन्हें गांव से जोड़कर रखा जा सकता है।
उन्होंने बागवानी, कृषि, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, स्थानीय उत्पादों की मार्केटिंग, ग्रामीण पर्यटन और होम-स्टे जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देने की जरूरत बताई। साथ ही पलायन प्रभावित गांवों के लिए अलग विकास पैकेज तैयार कर योजनाओं को समयबद्ध तरीके से धरातल पर उतारने की मांग की।
ग्रामवार सर्वे और विशेष कार्ययोजना की मांग
पंवार ने सरकार और प्रशासन से जखाली, धोसाली, घूंड, कोटला तथा आसपास के गांवों का विशेष ग्रामवार सर्वे कराने की मांग की। सर्वे में कुल परिवार, गांव में वर्तमान में रह रहे परिवार, बाहर जा चुके परिवार, खाली मकानों और पलायन के कारणों का रिकॉर्ड तैयार करने की मांग की गई है।
उन्होंने कहा कि सर्वे के बाद प्रत्येक गांव के लिए अलग विकास कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए और उसकी नियमित समीक्षा भी होनी चाहिए।
“गांव बचेंगे तो पहाड़ की पहचान बचेगी”
दर्मियान सिंह पंवार ने कहा कि पहाड़ के गांव केवल मकानों का समूह नहीं हैं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, परंपरा, कृषि और सामाजिक पहचान के आधार हैं। उन्होंने कहा कि पलायन रोकने के लिए कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर काम दिखाई देना चाहिए।
उन्होंने सरकार से नौगांव विकासखंड के पलायन प्रभावित गांवों को प्राथमिकता के आधार पर विकसित करने तथा जखाली, धोसाली, घूंड और कोटला समेत अन्य प्रभावित गांवों के लिए विशेष पुनर्वास एवं आजीविका योजना तैयार करने की मांग की।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि अब समय केवल पलायन की चर्चा करने का नहीं, बल्कि गांवों को बचाने के लिए ठोस और परिणामदायी कदम उठाने का है।



