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बड़कोट में “रवांई : लोक संस्कृति एवं पर्यटन” पुस्तक का भव्य लोकार्पण एवं पोस्टर विमोचन और शिक्षक संगोष्ठी

रवांई की लोकसंस्कृति, परंपराओं, लोकभाषा और पर्यटन को नई पहचान देने वाली महत्वपूर्ण कृति बताया गया

बड़कोट। नगर पालिका परिषद बड़कोट परिसर में रविवार, 10 मई 2026 को रवांई क्षेत्र के सुप्रसिद्ध लोक साहित्यकार ध्यान सिंह रावत ‘ध्यानी’ द्वारा लिखित पुस्तक “रवांई : लोक संस्कृति एवं पर्यटन” का भव्य लोकार्पण एवं पोस्टर विमोचन समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम साहित्य, शिक्षा, संस्कृति एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों की गरिमामयी उपस्थिति के बीच संपन्न हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षक, साहित्य प्रेमी, सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि एवं स्थानीय नागरिक मौजूद रहे।

 

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार महावीर सिंह रवाल्टा रहे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता विनोद डोभाल ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ० सुबोध बिष्ट उपस्थित रहे। कार्यक्रम में अवतार सिंह चौहान एवं जयदेव सिंह रावत की विशेष उपस्थिति रही। कार्यक्रम का आयोजन प्राथमिक शिक्षक संघ उत्तरकाशी द्वारा किया गया तथा संयोजन Azim Premji Foundation⁠� के सहयोग से संपन्न हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं पुस्तक के औपचारिक लोकार्पण के साथ हुआ। मंचासीन अतिथियों ने पुस्तक के आवरण का अनावरण करते हुए लेखक ध्यान सिंह रावत ‘ध्यानी’ को इस महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान के लिए शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम के दौरान पुस्तक के पोस्टर का भी विमोचन किया गया, जिसे उपस्थित लोगों ने अत्यंत सराहनीय प्रयास बताया।

शिक्षक संगोष्ठी में सर्वप्रथम ख़ज़ान सिंह, अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा शिक्षा के पेशे और शिक्षक की भूमिका पर अपने विचार रखे गये। उन्होंगे कहा की बच्चों की भाषाई दक्षता को हांसिल करने में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२० भारतीय ज्ञान प्रणाली और भारतीय भाषाओं को शिक्षण से जोड़ने की पैरवी करती है और इस दिशा में लेखक के प्रयास अद्भुत हैं। लेखक ने रवांई की संस्कृति, परंपराओं और लोकभाषा को जिस संवेदनशीलता और गहराई से शब्दों में पिरोया है, वह अत्यंत प्रशंसनीय है।

अपने संबोधन में मुख्य अतिथि महावीर सिंह रवाल्टा ने कहा कि “रवांई : लोक संस्कृति एवं पर्यटन” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि रवांई क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा, परंपराओं और लोकजीवन का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब आधुनिकता के प्रभाव से लोकसंस्कृतियां धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, ऐसे समय में इस प्रकार की पुस्तकें समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करती हैं। उन्होंने कहा कि लेखक ने रवांई की संस्कृति, परंपराओं और लोकभाषा को जिस संवेदनशीलता और गहराई से शब्दों में पिरोया है, वह अत्यंत प्रशंसनीय है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विनोद डोभाल ने कहा कि रवांई क्षेत्र सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध क्षेत्र है, लेकिन इसकी परंपराओं और लोक विरासत को व्यापक स्तर पर सामने लाने के प्रयास बहुत कम हुए हैं। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक न केवल साहित्य प्रेमियों बल्कि पर्यटन और शोध के क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों के लिए भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।

विशिष्ट अतिथि डॉ० सुबोध बिष्ट ने पुस्तक की विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहा कि लेखक ने रवांई क्षेत्र के इतिहास, सामाजिक संरचना, लोकविश्वास, लोकदेवताओं, मेलों, पर्वों और लोकजीवन को अत्यंत सरल एवं प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में रवांई क्षेत्र की विभिन्न पट्टियों, गांवों और सामाजिक जीवन का व्यापक अध्ययन दिखाई देता है। पुस्तक शोधपरक होने के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी सहज एवं रोचक है।

उन्होंने कहा कि पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल संस्कृति का वर्णन ही नहीं, बल्कि रवांई क्षेत्र की बोली रवांल्टी के संरक्षण और उसके साहित्यिक महत्व को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया है। पुस्तक में पांडव नृत्य, देव डोली नृत्य, जोगड़ा नृत्य और हरण नृत्य जैसे पारंपरिक लोकनृत्यों के साथ विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीतों एवं लोककथाओं को भी विस्तार से शामिल किया गया है, जिससे यह कृति और अधिक समृद्ध बन गई है।

लेखक ध्यान सिंह रावत ‘ध्यानी’ ने अपने संबोधन में कहा कि इस पुस्तक को तैयार करने का उद्देश्य रवांई क्षेत्र की लोकसंस्कृति, परंपराओं और पर्यटन स्थलों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि वर्षों तक क्षेत्र के गांवों, लोक कलाकारों, बुजुर्गों और सामाजिक परंपराओं का अध्ययन करने के बाद इस पुस्तक को तैयार किया गया। उन्होंने कहा कि यदि हमारी लोकसंस्कृति और भाषा सुरक्षित रहेगी, तभी हमारी पहचान भी सुरक्षित रह पाएगी।

पुस्तक में रवांई क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन स्थलों का भी अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है। सरनौल, मोरी, पुरोला, नौगांव, बड़कोट, हनोल, हरकीदून, रूपिन घाटी, दयारा बुग्याल, नचिकेता ताल तथा यमुनोत्री धाम सहित अनेक प्रसिद्ध एवं अल्पज्ञात स्थलों की जानकारी पुस्तक में विस्तार से दी गई है। पुस्तक पाठकों को पर्यटन स्थलों की जानकारी देने के साथ-साथ वहां के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन से भी परिचित कराती है।

पुस्तक में लोकपर्वों, पारंपरिक खान-पान, वेशभूषा, आभूषण, पशुपालन, वन संपदा और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों को भी गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। वक्ताओं ने कहा कि यह पुस्तक उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को समझने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए संग्रहणीय एवं प्रेरणादायी कृति सिद्ध होगी।

कार्यक्रम में हिमांतर प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक के प्रकाशक प्रदीप रवाल्टा ने कहा कि क्षेत्रीय लोकसाहित्य और लोकसंस्कृति को बढ़ावा देने वाली पुस्तकों का प्रकाशन समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हिमांतर प्रकाशन भविष्य में भी उत्तराखंड की लोक संस्कृति और साहित्य से जुड़ी महत्वपूर्ण कृतियों को प्रकाशित करने का कार्य करता रहेगा।

इस अवसर पर प्रहलाद रावत, विजेंद्र विश्वकर्मा, प्रताप राणा, विनोद असवाल, चरण सिंह रावत, जनक सिंह राणा, संगीता रावत, यशवंत पंवार, अनुपमा रावत, जमुना रावत, प्रदीप चौहान, अनूज सिंह बनाली, जयवीर सिंह रावत, अवनीश शुक्ला, दिनेश कोठियाल, नवदीप, कनिका, अर्चना, अरिंदम, आदर्श, राजेश अग्रवाल, अर्जुन सिंह रावत, उत्तराखंड की प्रथम महिला ई-रिक्शा चालक, अतुल सिंह भंडारी तथा रुकम सिंह रावत सहित बड़ी संख्या में शिक्षकगण, साहित्य प्रेमी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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