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आजादी के 78 साल बाद भी मोरी बाजार में नहीं बना एक भी सार्वजनिक शौचालय, जनहित की पहल पर चला वन विभाग का हथौड़ा| Mori Market Toilet Dispute: 78 Saal Baad Bhi Public Toilet Nahi

जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीनता, प्रशासनिक दोहरे मापदंड और विकास के खोखले दावों का आईना बन चुका है।

पुरोला (उत्तरकाशी)। उत्तरकाशी जनपद की पुरोला विधानसभा अंतर्गत विकासखंड मोरी का मुख्य बाजार आजादी के बाद से अब तMori Market Toilet Dispute: 78 Saal Baad Bhi Public Toilet Nah बुनियादी सुविधा से वंचित है। हैरानी की बात यह है कि 78 वर्षों में किसी भी जनप्रतिनिधि ने मोरी बाजार में एक अदद सार्वजनिक शौचालय तक बनवाने की जहमत नहीं उठाई, जिससे स्थानीय लोगों, महिलाओं, बुजुर्गों और दूर-दराज से आने वाले ग्रामीणों को रोजाना भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता रहा है।

इसी उपेक्षा और लापरवाही के दौर में नानाई जिला पंचायत वार्ड के जिला पंचायत सदस्य पवन दास ने जनता की पीड़ा को समझते हुए अपने निजी बजट से सार्वजनिक शौचालय निर्माण का साहसिक निर्णय लिया। सार्वजनिक स्थल का चयन कर निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया गया। लेकिन जैसे ही शौचालय का आधा निर्माण कार्य पूरा हुआ, वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और कार्य को रोकते हुए इसे रिजर्व फॉरेस्ट भूमि बताकर ध्वस्त करना शुरू कर दिया।

जनहित की दुहाई देते हुए जिला पंचायत सदस्य पवन दास ने विभागीय अधिकारियों से शौचालय निर्माण को न रोकने का आग्रह किया, लेकिन वन विभाग के अधिकारियों ने जनप्रतिनिधि की एक भी बात नहीं सुनी और जनसुविधा के निर्माण पर बेरहमी से कार्रवाई करते हुए ढांचा तोड़ दिया।

इस दौरान पवन दास ने कड़ा सवाल उठाते हुए कहा—

“आधा मोरी बाजार वन भूमि पर बसा हुआ है, वहां वर्षों से दुकानें, मकान और प्रतिष्ठान खड़े हैं, लेकिन वन विभाग ने कभी कोई कार्रवाई नहीं की। जब पहली बार जनहित में सार्वजनिक शौचालय बन रहा है, तब ही नियम-कानून याद आ रहे हैं।”

सबसे चिंताजनक और शर्मनाक पहलू यह है कि इस पूरे घटनाक्रम पर मोरी विकासखंड के तथाकथित जनसेवक पूरी तरह मौन साधे बैठे हैं। ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, ब्लॉक प्रमुख, सामाजिक कार्यकर्ता और यहां तक कि पुरोला विधायक — जिनका यह गृह क्षेत्र है — किसी ने भी जनता के पक्ष में एक शब्द तक नहीं बोला।

जनता सवाल कर रही है कि—

क्या विकास के नाम पर सिर्फ भाषण ही जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है?

क्या जनसुविधाएं सिर्फ चुनावी जुमले बनकर रह गई हैं?

और क्या मोरी की जनता बुनियादी सुविधाओं की भी हकदार नहीं है?

मोरी बाजार में सार्वजनिक शौचालय का मुद्दा अब सिर्फ एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीनता, प्रशासनिक दोहरे मापदंड और विकास के खोखले दावों का आईना बन चुका है।

जनता अब जवाब चाहती है, चुप्पी नहीं।

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