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मोरी में वन नियमों पर दोहरा रवैया| Mori mein Van Niyamon par Dohra Ravaiya?

शौचालय पर हथौड़ा, सेंचुरी में सड़क पर मौन

मोरी (उत्तरकाशी)। एक ओर आज़ादी के दशकों बाद भी उत्तरकाशी जनपद के मोरी विकासखंड में जब सार्वजनिक शौचालय जैसी बुनियादी जनसुविधा का निर्माण शुरू होता है, तो वन भूमि का हवाला देकर वन विभाग द्वारा निर्माण कार्य पर तत्काल रोक लगाते हुए हथौड़ा चलाने की कार्रवाई की जाती है। वहीं दूसरी ओर, इसी मोरी विकासखंड के सेंचुरी जैसे आरक्षित वन क्षेत्र में बिना किसी वन विभागीय क्लियरेंस के सड़क निर्माण कर दिया जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार गैंच्वाण गांव नाले से रेंज कार्यालय तक सड़क निर्माण कर दिया गया है, जबकि यह क्षेत्र पूरी तरह आरक्षित वन क्षेत्र की श्रेणी में आता है। ग्रामीणों का आरोप है कि इस निर्माण कार्य के दौरान न केवल वन संपदा को नुकसान पहुंचा है, बल्कि नियमों की इस प्रकार की अनदेखी निकट भविष्य में किसी बड़ी आपदा को सीधा न्योता दे सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में बिना वैज्ञानिक तकनीक और वैधानिक अनुमति के सड़क कटान से भूस्खलन का खतरा बढ़ता है, जल स्रोत सूख सकते हैं और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब इस पूरे प्रकरण को लेकर संबंधित वन विभाग के रेंज अधिकारी से जानकारी ली गई, तो उनका कहना था कि उन्हें इस सड़क निर्माण की कोई जानकारी नहीं है। यह बयान अपने आप में कई सवालों को जन्म देता है।

यदि रेंज कार्यालय तक बनने वाली सड़क की जानकारी ही रेंज अधिकारी को नहीं है, तो आरक्षित वन क्षेत्र में किसी अवैध गतिविधि, वन अपराध या आपदा की स्थिति में सूचना विभाग तक कैसे पहुंचेगी?

यह स्थिति उस समय और भी गंभीर हो जाती है जब एक ओर उत्तराखंड के सैकड़ों गांव वर्षों से वन भूमि क्लियरेंस के नाम पर सड़क जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित हैं। कई गांव आज भी आपात स्थिति में मरीजों को कंधों पर ढोने को मजबूर हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर बिना किसी स्पष्ट अनुमति के सेंचुरी क्षेत्र में सड़क निर्माण होना व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास नियमों और पर्यावरणीय संतुलन के साथ होना चाहिए। यदि जनसुविधा के छोटे-छोटे कार्यों पर सख्ती और बड़े निर्माण कार्यों पर चुप्पी साध ली जाए, तो यह न केवल प्रशासनिक असमानता को दर्शाता है, बल्कि आम जनता के विश्वास को भी ठेस पहुंचाता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि—

क्या वन नियम केवल जनसुविधाओं के लिए ही सख्त हैं?

क्या आरक्षित वन क्षेत्र में नियमों की अनदेखी किसी की शह पर की गई?

और क्या इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच होगी?

यह मामला केवल एक सड़क या शौचालय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और जनहित से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। आवश्यकता है कि इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और भविष्य में ऐसी लापरवाही से होने वाली किसी भी संभावित आपदा को रोका जा सके

 

 

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